आतंकवाद पर सख्ती या सस्ती राजनीति? – एक लोकतांत्रिक प्रश्नों भरा लेख
लेखक: एक जागरूक कांग्रेसी नागरिक
देश एक बार फिर दहला, जब पहलगांव की ज़मीन पर आतंकवाद ने जवानों के खून से लाल रंग उकेरा। हर बार की तरह सरकार ने फिर कहा – “हम जवाब देंगे”, “हम बर्दाश्त नहीं करेंगे”, “देश भूल नहीं सकता”... परंतु क्या हम केवल शब्दों से देश की रक्षा कर सकते हैं? क्या केवल हवाई हमलों की खबरें और टीवी डिबेट में राष्ट्रवाद का चिल्लाना, वास्तव में आतंकवाद का हल है? क्या सवाल पूछना अब भी देशभक्ति है, या यह भी 'राष्ट्रद्रोह' कहकर दबा दिया जाएगा?
---
1. आतंकियों की गिनती किसने की?
पुलवामा हमले के बाद भारत सरकार ने बालाकोट में एयर स्ट्राइक करने का दावा किया। सरकार समर्थक मीडिया ने 300 से ज्यादा आतंकियों के मारे जाने की खबर चलाई। मगर किसने गिनी ये लाशें? किसने देखा? किस रिपोर्ट पर ये आंकड़ा टिका है?
— तत्कालीन वायुसेना प्रमुख बी.एस. धनोआ तक ने कहा, “हमने निशाना बनाया, लेकिन कितने मारे गए, ये सरकार को तय करना है।”
— तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एस.एस. अहलूवालिया ने कहा, “हमने किसी को मारने का दावा ही नहीं किया।” फिर ये आंकड़े कहां से आए?
क्या यह 'राष्ट्रवाद' की दुकानदारी नहीं थी?
---
2. RDX कहाँ से आया? किसने पहुंचाया?
पुलवामा हमले में 350 किलो से अधिक RDX का इस्तेमाल हुआ था। देश की सीमाएं किसके नियंत्रण में हैं? BSF, CRPF, RAW, IB किसके अधीन हैं?
— ये विस्फोटक कैसे आया?
— इतना भारी मात्रा में विस्फोटक देश में घुस गया, 70 गाड़ियों का काफिला टारगेट बना और किसी को भनक नहीं लगी?
— क्या यही 'न्यू इंडिया' की सुरक्षा नीति है, जहां इंटेलिजेंस फेल हो जाए और कोई जवाबदेही न हो?
--
3. हेलिकॉप्टर क्यों नहीं मिले? जवानों ने क्यों माँगे थे?
शहीद जवानों के परिजनों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, CRPF ने हवाई परिवहन की माँग की थी, क्योंकि लगातार काफिले पर खतरे की चेतावनी थी।
— फिर भी उन्हें 70 से अधिक गाड़ियों में चलने के लिए मजबूर किया गया।
— क्यों नहीं दिया गया हेलिकॉप्टर? क्या यह जानबूझकर लापरवाही नहीं थी?
--
4. बम कहाँ बरसाए गए? क्या सबूत है?
बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद सरकार ने बड़ी-बड़ी बातें कीं — “हमने घर में घुसकर मारा” — लेकिन:
— कोई स्वतंत्र मीडिया टीम उस जगह नहीं जा सकी।
— BBC, Reuters, और Al Jazeera जैसे अंतरराष्ट्रीय चैनलों ने रिपोर्ट दी कि बम जंगल में गिरे, किसी आतंकी कैंप का नामोनिशान नहीं दिखा।
— यदि वाकई 300 आतंकी मारे गए, तो उनके शव? उनके नाम? DNA रिपोर्ट? विदेशी खुफिया एजेंसियों की पुष्टि?
---
5. पहलगांव में सुरक्षा क्यों नहीं थी?
अभी हाल ही में पहलगांव में हमला हुआ, जिसमें एक बार फिर हमारे जवान मारे गए। इतनी संवेदनशील जगह, आतंक के खतरे के बाद भी सुरक्षा क्यों चूक गई?
— सरकार हर हमले के बाद क्यों जागती है?
— क्या ये सिलसिला सिर्फ “हमले, बयानबाज़ी, चुनावी फायदा” तक सीमित है?
--
6. आतंक पर सिर्फ बोलबाजी क्यों? नीति कहाँ है?
2014 से अब तक:
— उरी, पठानकोट, पुलवामा, लद्दाख, पूंछ, राजौरी, पहलगांव — लगातार आतंकी घटनाएं होती रहीं।
— हर बार सरकार ने एक ही रटा-रटाया जवाब दिया: “हमने जवाब दे दिया” — मगर कब तक?
— क्या सरकार की पूरी रणनीति सिर्फ राष्ट्रवाद के नाम पर वोट बटोरना है, या वाकई कोई ठोस नीति है?
---
7. आतंकी घटनाओं पर राजनीति क्यों?
किसी भी लोकतंत्र में सुरक्षा व्यवस्था सरकार की जिम्मेदारी होती है। लेकिन भारत में यह मुद्दा सरकार के लिए राजनीतिक हथियार बन चुका है।
— पुलवामा हमले के बाद प्रचार और पोस्टर में जवानों की तस्वीरें, “मोदी है तो मुमकिन है” जैसे नारे, और चुनाव प्रचार में एयर स्ट्राइक का इस्तेमाल — क्या ये सब शहीदों के सम्मान का अपमान नहीं था?
— कौन जवाब देगा उस माँ को, जिसने बेटे को खोया और टीवी पर उसकी तस्वीरें प्रचार में देखीं?
---
निष्कर्ष: सवाल पूछना ही सच्ची देशभक्ति है
सरकार बदलती है, सत्ता आती जाती है, लेकिन शहीद की चिता पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
जो सरकार जवानों की सुरक्षा नहीं कर सकती, जो RDX की घुसपैठ नहीं रोक सकती, जो हर हमले के बाद भाषण देती है, उसे सवालों का सामना करना होगा।
हम पूछेंगे — क्योंकि हम कांग्रेसी हैं।
हम चुप नहीं रहेंगे — क्योंकि हम देशभक्त हैं।
हम झुकेंगे नहीं — क्योंकि हम लोकतंत्र के प्रहरी हैं।