✍🏻 अब कृषि घाटे का सौदा क्यों बनती जा रही है?
भारत एक कृषि प्रधान देश है, और हमारा किसान देश की रीढ़ है। लेकिन यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि वही किसान आज खुद सबसे कमजोर, सबसे उपेक्षित और सबसे पीड़ित बन गया है। एक समय था जब खेती को “देश की आत्मा” कहा जाता था, लेकिन आज यही खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है।
खाद की मार
कृषि का पहला आधार – खाद। पहले यूरिया, डीएपी, पोटाश जैसे खाद सरलता से और सस्ते में मिल जाते थे। लेकिन अब इनकी कीमतें दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं। एक बोरी डीएपी 1200 रुपये तक पहुंच गई है। यही नहीं, छोटे दुकानदार इसमें कालाबाज़ारी करते हैं, स्टॉक छिपाते हैं, और मजबूर किसान को महंगे दामों पर खरीदने को मजबूर करते हैं। किसान खेत में मेहनत करे और खाद के बिना फसल न उगे, तो उसकी मेहनत बर्बाद।
डीज़ल और बिजली की दोहरी चोट
आज ट्रैक्टर चलाने के लिए डीजल चाहिए। सिंचाई के लिए पानी खींचने के लिए डीजल और बिजली – दोनों चाहिए। लेकिन डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। गांवों में बिजली की स्थिति वैसे भी बदतर है – या तो समय पर नहीं आती, या फिर दिन में 2-4 घंटे ही मिलती है। ऊपर से बिल इतना आता है कि किसान उसे भर ही नहीं पाता।
कई राज्यों में किसानों के नाम पर फ्री बिजली की घोषणा होती है, लेकिन हकीकत ये है कि फ्री बिजली की लाइन में करंट ही नहीं आता। और अगर आता भी है, तो इतना कम वोल्टेज कि मोटर जल जाए।
बाज़ार में लूट, मुनाफा बिचौलियों को
मान लें, किसान ने सारी मेहनत करके फसल उगा भी ली, तो क्या वह अपने गेहूं, सरसों, चना, मूंग या धान का सही दाम पा पाता है? बिलकुल नहीं।
किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नाम की एक झुनझुना थमाया जाता है, लेकिन ज़्यादातर किसान को मंडी में MSP से नीचे ही फसल बेचनी पड़ती है। क्यों? क्योंकि उसे फौरन पैसा चाहिए – शादी करनी है, कर्ज चुकाना है, बच्चों की फीस भरनी है।
मंडी में बिचौलिये बैठते हैं जो किसानों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं। फसल का सही दाम तो बड़ी कंपनियां और व्यापारी ले जाते हैं, जबकि किसान के हाथ कुछ नहीं आता।
कर्ज़, आत्महत्या और प्रशासन की चुप्पी
एक गरीब किसान को अपनी बीज, खाद, सिंचाई, ट्रैक्टर, मज़दूरी के लिए हर साल कर्ज़ लेना पड़ता है। फसल यदि खराब हो जाए – चाहे बारिश कम हो जाए, ओले पड़ जाएं, या कीट लग जाए – तो उसे कुछ नहीं मिलता। बैंक लोन के नाम पर बुलाता है, और साहूकार तो सीधे धमकी देता है।
आज स्थिति यह हो गई है कि देश में हर साल हजारों किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कोई कीटनाशक पीकर मर रहा है, कोई फांसी लगा रहा है।
सरकार कहती है “हम योजना लाएंगे”, लेकिन ज़मीनी स्तर पर एक भी योजना किसान तक नहीं पहुँचती। बीमा कंपनियां प्रीमियम तो काट लेती हैं, लेकिन मुआवज़ा देने में टालमटोल करती हैं।
खेती का भविष्य और गाँव का खालीपन
आज गांवों से युवा शहर भाग रहे हैं। कोई मजदूर बन रहा है, कोई चौकीदार, कोई रिक्शा चला रहा है। क्योंकि खेती अब रोज़गार नहीं, संकट बन गई है। अगर जल्द ही नीति नहीं बदली, तो गांव खाली हो जाएंगे और शहरों में भीड़ और गरीबी बढ़ेगी।
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🔴 निष्कर्ष:
कृषि को अगर दोबारा लाभ का व्यवसाय बनाना है, तो सरकार को सबसे पहले खाद, बिजली और डीज़ल को सस्ता करना होगा।
दूसरा – फसल की खरीद MSP से नीचे न हो, इसका सख़्त क़ानून बने।
तीसरा – फसल बीमा और कर्ज़ राहत तुरंत किसान तक पहुंचे, ये सुनिश्चित किया जाए।
चौथा – किसान को सम्मान, स्थायित्व और न्याय मिले – तभी भारत की आत्मा सुरक्षित रहेगी।
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✍🏻 मलखान सिंह भदौरिया
कांग्रेस नेता, डोंगरपुरा (भिंड)