❝उत्सव या पाप का पर्व?❞
✍️ लेखक – समाजसेवी मलखान सिंह भदौरिया
समाज में एक विचित्र विरोधाभास देखने को मिलता है। जब कोई माता-पिता अपने संतान का जन्मदिन मनाते हैं, तो वे खुशियों का इजहार करते हुए मांसाहारी भोजन परोसते हैं — यानी किसी बेजुबान जीव के बेटे की हड्डियां तोड़कर, उसका मास चूसकर अपने बच्चे की लंबी उम्र की कामना करते हैं। यह कैसी विडंबना है? यह कैसा उत्सव है?
हम अपने बच्चों की उम्र बढ़ाने के लिए किसी दूसरे के प्राण हर लेते हैं। जिस जीव ने कोई अपराध नहीं किया, जो हमारी तरह इस धरती पर जीने का अधिकारी है, उसे मौत के घाट उतारकर, फिर उसी खून से सनी थाली को "खुशी" का नाम दे देना — क्या यही सभ्यता है?
सच्ची खुशी तब मिलती है जब:
किसी भूखे को अन्न का एक निवाला दे दिया जाए,
किसी बीमार को रक्तदान करके जीवनदान दिया जाए,
किसी जरूरतमंद कन्या के विवाह में सहयोग देकर उसका घर बसाया जाए।
यह सब करने से आत्मा को शांति मिलती है। लेकिन जो अपने स्वार्थ की तुष्टि के लिए दूसरों की जान लेता है, वह न पुण्य करता है, न धर्म।
फिर वही लोग मंदिरों में जाकर मूर्तियों के सामने सिर झुकाते हैं। हाथ जोड़ते हैं, मन्नतें मांगते हैं। परंतु क्या कोई यह सोचता है कि हमने उस ईश्वर के बनाये जीवों का ही वध किया है?
147 वर्षों बाद जब कोई महापर्व आता है, तो समाज पुण्य की आशा से व्रत करता है, कथा करता है, चढ़ावा चढ़ाता है। लेकिन जिनके हाथों में जीवों का रक्त लगा हो, उनके व्रत, उनकी प्रार्थनाएं क्या सच में स्वीकार होती होंगी?
यह सोच से परे है कि हम धर्म के नाम पर या आनंद के नाम पर पाप कर बैठते हैं और फिर पुण्य की आशा करते हैं।
अब समय आ गया है कि हम सामाजिक, धार्मिक और आत्मिक स्तर पर आत्मचिंतन करें।
हमें उत्सवों को अन्य के दुःख से नहीं, बल्कि किसी के चेहरे की मुस्कान से जोड़ना होगा।
हमें त्याग, सेवा और दया को ही धर्म का पहला चरण मानना होगा।
> "जीव हिंसा से बड़ा कोई पाप नहीं, और करुणा से बड़ा कोई धर्म नहीं।"
— यही हमारा मूल संदेश होना चाहिए।
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✒️ लेखक:
मलखान सिंह भदौरिया
समाजसेवी,