धर्म नहीं, वोट का हथियार बन गया है – भारतीय राजनीति का कटु यथार्थ
✍️ लेखक: मलखान सिंह भदौरिया
(पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष, मध्य प्रदेश किसान कांग्रेस)
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प्रस्तावना: जब धर्म राजनीति की भेंट चढ़ा
भारत जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता से परिपूर्ण देश में धर्म, एक आस्था का विषय होना चाहिए, न कि राजनीतिक एजेंडा। लेकिन बीते कुछ वर्षों में जिस प्रकार से धार्मिक नारों, प्रतीकों और भावनाओं का इस्तेमाल वोट बटोरने के हथियार के रूप में हुआ है, उसने भारत की लोकतांत्रिक गरिमा को आघात पहुंचाया है। आज धर्म को ‘वोट बैंक’ में तब्दील कर दिया गया है, और इस खेल में सबसे ज़्यादा ठगा गया है आम हिंदुस्तानी।
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राजनीतिक हिंदुत्व बनाम सामाजिक यथार्थ
आज जो लोग हिंदुत्व की दुहाई देते नहीं थकते, वे क्या कभी हिंदू समाज की मूल समस्याओं पर चर्चा करते हैं?
क्या हिंदुओं के घरों में रोज़गार है?
क्या उनके रसोई गैस सिलेंडर सस्ते हुए हैं?
क्या उनके बच्चों को शिक्षा और स्कॉलरशिप मिली है?
क्या उन्हें जीएसटी से छूट मिली है?
क्या महंगाई की आग से उनकी थाली बची है?
नहीं।
सिर्फ़ मंदिरों की ऊंचाई और झंडों की संख्या गिनने से धर्म की रक्षा नहीं होती। धर्म का वास्तविक अर्थ है – ध्यान, सेवा, परोपकार, सत्य और समानता। लेकिन जो लोग धर्म के नाम पर वोट मांगते हैं, वे इन मूल्यों को भूल चुके हैं। उन्हें न धर्म की चिंता है, न समाज की।
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ध्रुवीकरण की राजनीति: एक खतरनाक खेल
जब भी चुनाव आते हैं, मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम, भगवा-हरा जैसे मुद्दे मीडिया और मंचों पर छा जाते हैं। जनता का ध्यान हटाने के लिए यह सबसे आसान तरीका है।
बेरोजगारी पर बात नहीं होगी,
किसानों की आत्महत्या पर चर्चा नहीं होगी,
पेपर लीक, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य, शिक्षा, इन सब पर चुप्पी होगी।
लेकिन एक वर्ग को उग्र और दूसरा वर्ग डरा हुआ दिखा देना – यही राजनीतिक पाखंडियों की रणनीति है।
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हिंदू खतरे में नहीं है, लेकिन भूखा ज़रूर है
राजनीति में बार-बार यह भ्रम फैलाया गया कि हिंदू खतरे में है। लेकिन सच यह है कि हिंदू समाज आज बेरोजगारी, महंगाई, कुपोषण और असमानता के कारण संकट में है।
जो सत्ता में बैठकर धर्म के नाम पर भाषण दे रहे हैं, उन्हें अपने कार्यकाल का लेखा-जोखा देना चाहिए:
कितने युवाओं को नौकरी मिली?
कितने गांवों में सिंचाई की व्यवस्था हुई?
कितने गरीबों को दवा और इलाज मुफ़्त मिला?
अगर इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो धर्म की दुहाई देना केवल मूर्ख बनाने की साजिश है।
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धर्म का अपमान कर रहे हैं ‘धर्म रक्षक’
जो लोग धर्म की रक्षा के नाम पर लोगों को भड़काते हैं, वे धर्म की आत्मा की हत्या कर रहे हैं। क्योंकि धर्म कभी भी घृणा, हिंसा और द्वेष की शिक्षा नहीं देता।
भगवान राम, भगवान कृष्ण, गौतम बुद्ध, गुरु नानक, या स्वामी विवेकानंद – किसी ने भी धर्म के नाम पर किसी को अपमानित करने या राजनीतिक रोटियां सेंकने की अनुमति नहीं दी
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निष्कर्ष: अब सवाल पूछने का वक्त है
अब समय आ गया है कि जनता अपने नेताओं से सवाल पूछे:
हमें धर्म के नाम पर नहीं, काम के आधार पर वोट मांगिए।
मंदिर बनाइए, लेकिन स्कूल और अस्पताल भी बनाइए।
राम का नाम लीजिए, लेकिन रामराज्य जैसा शासन भी दीजिए।
धर्म भारत की आत्मा है, उसे राजनीति का मोहरा मत बनाइए।
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📌 आम जनता को अब जागरूक होना होगा। धर्म के नाम पर बहकने के बजाय, मुद्दों के नाम पर चुनाव लड़ने और लड़वाने का समय आ गया है। क्योंकि अगर हम चुप रहे, तो यह "धार्मिक राजनीति" हमारा कल भी निगल जाएगी।