शहादत और सियासत की टकराहट
भारत में जब भी कोई सैन्य ऑपरेशन होता है, देश की जनता गर्व से भर जाती है। वर्दी पहने जवानों के जज़्बे को सलाम करती है। लेकिन जब उन्हीं शहीदों की चिताओं पर सत्ता का तंबू गाड़ा जाने लगे, तो सवाल उठना लाज़मी है –
क्या शहादत अब सिर्फ एक चुनावी रणनीति बन गई है?
क्या लाशों से वोट की फसल काटी जाएगी?
हालिया "ऑपरेशन सिंदूर" को लेकर जो सियासी माहौल रचा गया है, वह इन सवालों को और गंभीर बनाता है। ऐसा लगता है कि अब सरकार न सिर्फ युद्ध को महिमामंडित कर रही है, बल्कि उसकी राख से राजनीति की सियाही भी बना रही है।
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भाग 1: क्या था 'ऑपरेशन सिंदूर'? और क्या बना दिया गया?
‘ऑपरेशन सिंदूर’ सेना का एक साहसिक कदम था – आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश। लेकिन जैसे ही टीवी स्क्रीन पर इसके विजुअल्स आए, सरकार की मशीनरी ने उसे देशभक्ति के नाम पर एक चुनावी ब्रांड में बदल दिया।
हर भाषण में इसका जिक्र।
हर रैली में शहीदों के नाम पर तालियां।
सोशल मीडिया पर ‘वीरता’ के पोस्टरों की भरमार है
जिस ऑपरेशन में जवानों ने खून बहाया, उसे राजनीतिक लाभ का हथियार बना लिया गया।
कहीं यह बलिदान का अपमान तो नहीं?
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भाग 2: ‘घर-घर सिंदूर’ – एक नया चुनावी प्रतीक
अब भाजपा के नेता कहते हैं –
“घर-घर सिंदूर पहुंचाएंगे।”
सवाल ये है कि क्या ‘सिंदूर’ अब बलिदान का प्रतीक बन गया है? क्या यह सन्देश देना चाहते हैं कि हर घर में शहीदों का खून गिरा है, अब हर घर से वोट गिरना चाहिए?
‘सिंदूर’ जहां एक ओर नारी सम्मान, स्नेह और सामाजिक मर्यादा का प्रतीक है – वहीं दूसरी ओर इसे अब राजनीति का प्रतीक बना देना न केवल संवेदनहीनता है, बल्कि मूल्यों की हत्या भी है।
> अब प्रचार यह है:
“देश के लिए हमने शहीद दिये, अब देश हमें वोट दे।”
क्या बलिदान की कीमत वोट है?
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भाग 3: राष्ट्रवाद या रणनीति?
मोदी सरकार पर यह आरोप पहले भी लगता रहा है कि वह सेना के नाम पर वोट मांगती है। सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर पुलवामा तक – हर बार देशद्रोहियों पर कार्रवाई को चुनावी मंच पर लाया गया।
लेकिन 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद तो हद पार हो गई।
अब शहीदों के नाम पर रैलियां, पोस्टर, नारे –
यह एक "इमोशनल प्रोपेगेंडा" है, जिसमें जनता के देशप्रेम को भड़काकर वोटों में बदला जा रहा है।
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निष्कर्ष: देश के लिए मरे हैं, पार्टी के लिए नहीं
शहीदों की शहादत सिर्फ एक पार्टी की पूंजी नहीं हो सकती। वे भारत के बेटे थे, किसी पार्टी के प्रचारक नहीं। अगर कोई सरकार उनकी कुर्बानी से वोट बटोरना चाहती है, तो यह राष्ट्रवाद नहीं, अवसरवाद है।
> क्या आज़ादी के अमर बलिदानियों ने सोचा था कि उनकी शहादत को वोट बैंक बना दिया जाएगा?
देश की जनता को समझना होगा –
देशप्रेम टीवी पर नहीं, तर्क और सच्चाई पर होना चाहिए।
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✊ अंत में एक सवाल:
> क्या हम वाकई देशभक्त हैं, या सिर्फ भावुक वोटर?
अगर आप देश से प्रेम करते हैं, तो लाशों की राजनीति को नकारिए।
सेना को सेना रहने दीजिए, उसे चुनावी हथियार मत बनने दीजिए।