शीर्षक: "भगवान को भी जातियों में बांट दिया गया है – टूटता भारत, बिखरती अखंडता" -मलखानसिंह भदौरिया
लेखक: मलखान सिंह भदौरिया, भिंड (समाजसेवी)
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भारत, जिसे हम विश्व गुरु कहते हैं, जिसकी संस्कृति, सभ्यता और अखंडता की मिसालें दी जाती रही हैं, आज उसी भारत को धर्म, जाति और वर्गों में इस तरह टुकड़े-टुकड़े किया जा रहा है कि "अखंड भारत" का नारा अब खोखला लगता है। पहले धर्म के नाम पर बांटा गया, फिर जातियों में, अब भगवानों को भी जातीय सीमाओं में बाँटकर भारत की आत्मा को टुकड़े-टुकड़े किया जा रहा है।
आज के समय में जिस तरह राजनीतिक दलों और स्वार्थी तत्वों ने भारत को जातियों में बाँटने का षड्यंत्र रचा है, वह एक अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है। इन ताकतों ने केवल समाज को नहीं बाँटा, बल्कि ईश्वर को भी टुकड़ों में बाँटने की धृष्टता की है।
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भगवान भी अब जातियों के दायरे में
आज हम देख रहे हैं कि
श्रीरामचंद्र जी को राजपूतों का भगवान कहा जा रहा है,
श्रीकृष्ण को यादवों का भगवान,
भगवान परशुराम को ब्राह्मणों का प्रतिनिधि,
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को अनुसूचित जातियों का भगवान बना दिया गया है।
इन विभाजनों ने ईश्वर की सार्वभौमिकता को संकुचित कर दिया है। जिस ईश्वर ने हर जाति, हर वर्ग, हर जीव के भीतर एक समान आत्मा का वास किया है, उसे हम मनुष्यों ने अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थ और सामाजिक अलगाव के लिए बाँट दिया है।
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राजनीति की दलदल में डूबती एकता
राजनीतिक दल अब केवल वोटों की राजनीति कर रहे हैं।
धर्मों में बाँटना, जातियों में गिनती करना, भगवानों के नाम पर समुदायों को लड़ाना, यही आज की राजनीतिक रणनीति बन गई है। चुनावी लाभ के लिए एक को आरक्षण का वादा, दूसरे को धर्म के नाम पर उत्तेजना, तीसरे को जाति की शान का झुनझुना — और इस सब के बीच टूट रहा है भारत।
अखंड भारत का सपना क्या केवल नारा है? अगर हम भारत को टुकड़ों में बाँटकर वोटों की गिनती में मशगूल हैं, तो फिर यह सपना नहीं, एक धोखा है — खुद से भी और आने वाली पीढ़ियों से भी।
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इतिहास से वर्तमान तक – विभाजन की पीड़ा
पहले हमें गोरे और काले में बाँटा गया, फिर हिंदू और मुसलमान में, फिर भारत और पाकिस्तान में।
फिर आया जातिगत गणना का युग — ब्राह्मण, ठाकुर, कुर्मी, यादव, दलित, ओबीसी — और अब धार्मिक प्रतीकों और भगवानों को भी जातियों में बाँटने का प्रयास किया जा रहा है।
क्या अब ईश्वर भी किसी जाति या धर्म का बंधक बना दिया जाएगा?
ईश्वर, जो कण-कण में व्याप्त है, जिसे हमने ‘अहं ब्रह्मास्मि’ कहकर आत्मा के रूप में स्वीकारा, उसे किसी जाति, धर्म या वर्ग में बाँधना मानवता का सबसे बड़ा अपराध है। भगवान वह शक्ति है जो वृक्षों, नदियों, पशुओं, पक्षियों, मनुष्यों और हर जीव-जंतु में एक समान बसती है। वह कोई जाति विशेष की धरोहर नहीं।
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आज की सबसे बड़ी लड़ाई — चेतना की
आज हमें बाहरी दुश्मनों से उतना खतरा नहीं जितना भीतर से अपने ही समाज में फैले हुए जातिवादी, धर्मांध और अवसरवादी नेताओं से है। यह लड़ाई अब धर्म और जाति की नहीं, समझ और अज्ञान की है।
यह ईश्वर को सीमित करने वालों और ईश्वर को सार्वभौमिक मानने वालों के बीच की लड़ाई है।
किसी जाति, किसी वर्ग, किसी धर्म के नाम पर भगवान को विभाजित करने का अर्थ यह है कि हम उस सार्वभौमिक चेतना को खंडित कर रहे हैं जो भारत की आत्मा है।
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निष्कर्ष: अब जागने का समय है
भारत को फिर से जोड़ना होगा —
जातियों के पार जाकर, धर्मों की सीमाओं से ऊपर उठकर,
भगवान को भगवान की तरह देखने की जरूरत है, न कि किसी जाति के प्रतीक की तरह।
ईश्वर घाट-घाट का वासी है, वह किसी जाति, धर्म या वर्ग का बंधक नहीं।
उसे बाँटना असंभव है, लेकिन उसकी आड़ में समाज को तोड़ने वाले आज सबसे खतरनाक दुश्मन हैं।
हमें यह समझना होगा कि अखंड भारत पहले हमारे मन में बनता है, अगर मन खंडित है तो नक्शे पर चाहे जो बना लो, वो सिर्फ दिखावा है।
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लेखक
मलखान सिंह भदौरिया
समाजसेवी, डोंगरपुरा, भिंड (मध्य प्रदेश)