🪔 "सीज़फायर या 'सिंदूर का सौदा' – लहू की लकीर पर व्यापार की तिजारत?"
✍️ लेखक: मलखान सिंह भदौरिया, समाजसेवी एवं व्यंग्यकार
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"प्रधानमंत्री मौन हैं। राष्ट्र पूछ रहा है। जवाबदेही की जगह 'डिजिटल शांति' का चश्मा लगाया गया है।"
ऐसा लगता है जैसे मातम की चुप्पी और व्यापार की गूंज ने देशभक्ति को 'साइलेन्ट मोड' पर डाल दिया है।
20 दिन।
11 बार।
डोनाल्ड ट्रम्प साहब अमेरिका में बैठकर कहते रहे – "हमने भारत से कहकर ऑपरेशन रुकवाया।"
और उधर, हमारे प्रधानमंत्री जी कैमरे के सामने मुस्कुराते रहे जैसे कोई सास-ससुर के सामने दूल्हे की चुप्पी में ही बेटी की विदाई मंज़ूर हो।
तो क्या 'सिंदूर का सौदा' हुआ है?
क्या लहू से लिखे गए पराक्रम को सीज़फायर की स्याही से मिटा दिया गया?
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🔍 तीन सवाल हैं, और हर भारतीय को चाहिए जवाब:
1. क्या आपने अमेरिका के दबाव में आकर शहीदों की चिताओं पर चुप्पी ओढ़ ली?
एक हाथ में तिरंगा, दूसरे में व्यापार समझौता — और बीच में चुप्पी की दीवार।
क्या आज राष्ट्र की अस्मिता वॉशिंगटन की वीज़ा पॉलिसी से तय होगी?
2. क्या यह साज़िशन सीज़फायर ‘डॉलर डिप्लोमेसी’ का हिस्सा था?
यानी पहले गोली चलाओ, फिर खुद ही थाम लो। जनता को लगे की बहुत कुछ किया, लेकिन व्यापारियों को लगे कि कुछ बिगाड़ा नहीं।
3. क्या यह हमारी रणनीति थी या ट्रम्प साहब की मेहरबानी?
अगर वाकई हमारी शर्तों पर हुआ, तो आपने देश को क्यों नहीं बताया? और अगर नहीं हुआ — तो चुप क्यों हैं?
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🇮🇳 देश की जनता कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की पंक्तियों में खड़ी ‘एंकर’ नहीं है।
यह देश मां है — वह जानना चाहती है कि उसके बेटे की शहादत पर किसने सौदा किया।
'सिंदूर' भावनाओं का प्रतीक होता है, और 'सीज़फायर' कूटनीति का — पर जब शहादत को मौन से ढंका जाए, तो शंका भी बनती है और शर्म भी।---
🧨 जब देश का जवान सीमा पर खड़ा होता है, तो उसे यह जानने का अधिकार है:
कि क्या उसके प्राण किसी करारनामे की कोमा में खो जाएंगे?
कि क्या देश की 'कूटनीति' अब 'कूटनीतिक बिजनेस प्लान' है?
और क्या प्रधानमंत्री सिर्फ चुनावी भाषणों में बहादुर हैं?
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🔔 अब बहुत हुआ, प्रधानमंत्री जी!
"मौन रहना अब सम्मान नहीं, अपराध जैसा लगता है।"
जनता जवाब चाहती है। क्योंकि देश चुप नहीं रहेगा,
और शहीदों का खून कभी सौदेबाज़ी की भाषा नहीं समझता।
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✊ जय हिंद।
✍️ मलखान सिंह भदौरिया
समाजसेवी, व्यंग्यकार
(जिन्हें शब्दों की गोली चलानी आती है — और वो भी निशाने पर)