पत्रकारिता का आत्ममंथन: चौथे स्तंभ की आत्मा गिरवी क्यों पड़ी है?

पत्रकारिता का आत्ममंथन: चौथे स्तंभ की आत्मा गिरवी क्यों पड़ी है?

✍🏻 लेखक: मलखान सिंह भदौरिया,                 समाजसेवक

आज की ट्रेनिंग का टॉपिक चाहे जो भी हो — लेकिन उससे पहले एक बुनियादी सवाल हम सबको खुद से पूछना चाहिए:
क्या हम पत्रकारिता की उस आत्मा को अब भी थामे हुए हैं जिसके भरोसे देश का लोकतंत्र सांस लेता है?
या फिर कहीं हम सबने अपनी कलम को गिरवी रख दिया है?

देश की स्वतंत्र पत्रकारिता — जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया — क्या वह आज भी उतनी ही निष्पक्ष, निर्भीक और जनमुखी है जैसी उसे होना चाहिए? या फिर उसकी आत्मा अब बाजार, सत्ता, और विज्ञापन की दलदल में दब चुकी है?

आज न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।
टॉपिक तय करने से पहले यह तय करना ज़रूरी है कि आप किसके लिए काम कर रहे हैं — जनता के लिए या सत्ता के लिए?

क्या आज के पत्रकारिता मंचों ने अपने नैतिक उत्तरदायित्व खो दिए हैं?

देश की 145 करोड़ की आबादी में से एक बहुत बड़ा हिस्सा — सोशल मीडिया से लेकर गांव के चौपाल तक — आज मीडिया पर पक्षपात, बिकाऊपन और एकतरफा प्रचार का आरोप लगा रहा है।
जो मीडिया कभी जनता की आवाज़ था, आज वही जनता मीडिया से यह सवाल पूछ रही है:

क्या आपकी निष्पक्षता बिक गई?

क्या आपकी हेडलाइंस अब किसी पेड स्क्रिप्ट का हिस्सा हैं?

क्या आपकी खामोशी किसी सौदे का परिणाम है?

सोशल मीडिया: एक नया आईना

सोशल मीडिया वो आईना है जिसमें अब जनता खुद अपनी आवाज़ बन गई है।
अब न कोई एंकर की ज़रूरत है, न किसी चैनल की।
लोग खुद अपनी बात कह रहे हैं और वही जनता मीडिया से यह कह रही है —
"आप हमारे नहीं रहे। आपने हमें छोड़ दिया।"

तो क्या अब मीडिया को ट्रेनिंग की नहीं, चेतना और आत्मशुद्धि की ज़रूरत है?
क्या पत्रकारिता के लिए अब "कोर्स" नहीं बल्कि "चरित्र निर्माण" का समय है?

निष्कर्ष:

मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता मर चुकी है,
लेकिन यह ज़रूर मानता हूं कि वो बेहोश है, और उसे जागने की सख्त जरूरत है।

देश को फिर से उस पत्रकारिता की ज़रूरत है जो सत्ता से सवाल करे, जनता की पीड़ा को उठाए, और गरीब, कमजोर, किसान, युवा, और आम आदमी की आवाज़ बने।
वो पत्रकारिता जो बिके नहीं, झुके नहीं — बल्कि जले, तपे और उजाला करे।
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✍🏻 लेखक: मलखान सिंह भदौरिया
         समाजसेवक, भिण्ड मप्र

Malkhan Singh Bhadoriya | मलखान सिंह भदौरिया

l राजनैतिक जीवन- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के लोकप्रिय नेता व मेरे पसंदीदा नेता श्रीज्योतिरादित्य सिंधिया जी है जिनसे प्रभावित हो मैने तय किया कि मैं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दल की ही सदस्यता लूँगा और वर्ष 2001 मे मैने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जिसमे कांग्रेस छोड़कर कल्पना पारुलकर जी ने जॉइन कर ली थी राष्ट्रवादी कांग्रेस के चंबल ग्वालियर के लगभग 100 से अधिक पदाधिकारी गण श्रीसिंधिया जी से प्रभावित हो वर्ष 2002 में कांग्रेस मे शामिल हो गये इन 100 पदाधिकारीयों मे मलखानसिंह ने भी श्रीसिंधिया जी के समक्ष कांग्रेस जॉइन में कांग्रेस जॉइन कर ली वर्ष 2004 मे मलखानसिंह भदौरिया जिला युवक कांग्रेस भिण्ड की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष रहे फिर वर्ष 2006 में जिला कांग्रेस ग्रामीण में वरिष्ठ उपाध्यक्ष रहे वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में अटेर से निर्वाचित हुए पूर्व मंत्री श्री सत्यदेव कटारे जी ने मलखानसिंह को विधायक प्रतिनिधि नियुक्त किया वर्ष 2016 में मलखानसिंह को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सेवा इकाई मैं भिण्ड-दतिया जिले का समन्वयक नियुक्त किया गया मलखानसिंह की निरंतर सक्रियता के कारण उन्हें वर्ष 2017 में किसान कांग्रेस मप्र का प्रदेश उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया

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