📜 लेख शीर्षक: “श्रीमद् भागवत गीता और श्रीरामचरितमानस को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाया जाए”
✍️ — मलखान सिंह भदौरिया, समाजसेवी
आज हमारे देश की संस्कृति, मर्यादाएं और नैतिक मूल्य जिस तेज़ी से क्षीण होते जा रहे हैं, वह चिंता का विषय है। नई पीढ़ी आधुनिकता की दौड़ में भारतीय मूल्यों और आदर्शों से दूर होती जा रही है। इस स्थिति को बदलने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने बच्चों को बचपन से ही धर्म, संस्कृति, मर्यादा और जीवन के आदर्शों की सही शिक्षा दें।
श्रीमद् भागवत गीता और श्रीरामचरितमानस हमारे भारतीय दर्शन, नीति, धर्म, और जीवन मूल्यों के ऐसे स्तंभ हैं, जो न केवल आत्मोन्नति का मार्ग दिखाते हैं, बल्कि समाज को भी मर्यादित और संगठित रखते हैं।
आज के युवा मंदिर अवश्य जाते हैं, पूजा भी करते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते कि भगवान श्रीराम ने समाज को मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर क्या सिखाया। वे यह भी नहीं जानते कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में खड़े होकर गीता में क्या नीति और ज्ञान दिया, जो आज भी संसार के सबसे श्रेष्ठ प्रबंधन और जीवन-दर्शन का स्रोत है।
इसलिए यह समय की मांग है कि कक्षा पहली से लेकर दसवीं तक के पाठ्यक्रम में श्रीमद् भागवत गीता और श्रीरामचरितमानस को अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया जाए। यह किसी धर्म विशेष का प्रचार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और मूल्यों की शिक्षा है, जो हर छात्र के सर्वांगीण विकास में सहायक होगी।
👉 यह प्रस्ताव न केवल युवाओं को नैतिकता और मर्यादा से जोड़ने का कार्य करेगा, बल्कि उन्हें जीवन की दिशा, धैर्य, धर्म और विवेक का पाठ भी पढ़ाएगा।
सरकार, शिक्षा विभाग और नीति-निर्माताओं से मेरा आग्रह है कि इस दिशा में गंभीरता से विचार करें और आने वाली पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।
🚩 जय श्रीराम। जय श्रीकृष्ण। जय भारत।
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मलखान सिंह भदौरिया
समाजसेवी एवं जनहित चिंतक
भिण्ड, मध्य प्रदेश