हाईकोर्ट परिसर में मूर्ति स्थापना की मांग और संभावित विवाद: क्या संविधान निर्माता ही पर्याप्त हैं या और भी कई योग्य पात्र हैं?
प्रस्तावना:
ग्वालियर हाईकोर्ट परिसर में डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूर्ति लगाने को लेकर चल रहा विवाद धीरे-धीरे एक गहरे वैचारिक और व्यवस्थागत विमर्श में बदलता जा रहा है। संविधान निर्माता होने के नाते डॉ. अंबेडकर को सम्मान देना बिलकुल उचित है, लेकिन यह भी सत्य है कि संविधान निर्माण समिति में अनेक अन्य महत्वपूर्ण सदस्य भी थे। अगर केवल अंबेडकर की मूर्ति स्थापित की जाती है, तो यह सवाल भी उठता है कि क्या अन्य योग्य राष्ट्रनिर्माताओं की अनदेखी की जा रही है?
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संविधान निर्माण एक सामूहिक प्रयास था
यह स्वीकार करना होगा कि संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे, प्रारूप समिति में जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, और अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर जैसे महान नेता भी थे।
डॉ. अंबेडकर निर्विवाद रूप से प्रमुख योगदानकर्ता थे, लेकिन संविधान का निर्माण एक साझा बौद्धिक, वैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया थी।
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मूर्ति स्थापना से जुड़ी व्यापक चिंता:
यदि अंबेडकर की मूर्ति लगती है — जो एक प्रकार से न्यायपालिका में एक वैचारिक प्रतिनिधित्व का प्रतीक बनती है — तो आगे चलकर अन्य महापुरुषों जैसे:
पंडित जवाहरलाल नेहरू (भारत के प्रथम प्रधानमंत्री)
नेताजी सुभाष चंद्र बोस
पंडित दीनदयाल उपाध्याय
महात्मा गांधी
या यहां तक कि नरेंद्र मोदी (वर्तमान प्रधानमंत्री)
की मूर्तियों की भी मांग उठ सकती है।
और तब सवाल उठेगा — क्या हर वैचारिक या राजनैतिक प्रेरणा से जुड़ी मूर्ति को हाईकोर्ट जैसे संस्थानों में स्थापित किया जाना चाहिए?
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संविधान निर्माता vs संस्थागत परंपरा
डॉ. अंबेडकर को संविधान निर्माता होने के नाते पूरा देश सम्मान देता है, लेकिन न्यायालय परिसर जैसे संवेदनशील संस्थान में किसी एक विचार या प्रतिनिधि व्यक्ति की प्रतिमा लगाने से संस्था की तटस्थता और सार्वजनीनता प्रभावित हो सकती है।
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संभावित समाधान: एक संतुलित सुझाव
अगर मूर्ति स्थापना की परंपरा शुरू करनी ही है, तो क्यों न देश के पहले मुख्य न्यायाधीश (CJI) महाराजा हिरे लाल जे. केनिया की मूर्ति लगाई जाए, जिन्होंने भारत के न्यायिक स्तंभ की नींव रखी थी।
या फिर कोर्ट परिसर में "संविधान सभा स्मारक" के रूप में एक दीवार बनाई जाए, जिसमें सभी प्रमुख संविधान निर्माताओं के नाम और योगदान अंकित हों।
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निष्कर्ष:
कोई भी न्यायालय सिर्फ कानून का स्थान नहीं होता, वह सामाजिक विश्वास और संवैधानिक मर्यादाओं का केंद्र होता है।
यदि वहां कोई मूर्ति स्थापित की जाती है, तो वह न केवल श्रद्धा का प्रतीक, बल्कि विवाद और वैचारिक ध्रुवीकरण का कारण भी बन सकती है।
इसलिए, हमें यह तय करना होगा कि क्या हम न्यायालयों को प्रतीकवाद की राजनीति से ऊपर रख पाएंगे या आने वाले वर्षों में यह परंपरा असंतुलन और असहमति का केंद्र बन जाएगी।
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"सम्मान हर महापुरुष को मिलना चाहिए, लेकिन संवैधानिक संस्थानों में सम्मान के साथ संतुलन और तटस्थता भी अनिवार्य है।"