बलिदानों की विरासत और आज का राजनीतिक भ्रम
✍️ लेखक: मलखान सिंह भदौरिया
जिस कांग्रेस पार्टी ने भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिए वर्षों तक ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बिना हथियार उठाए, अहिंसा की राह पर चलते हुए संघर्ष किया, उसने भारत के लोकतंत्र की नींव रखी। इस संघर्ष में एक नहीं, सैकड़ों कांग्रेसजन जेलों में बंद रहे, सीने पर गोलियां खाईं। उसी बलिदानी परंपरा में एक परिवार ऐसा भी था जो पूरे का पूरा परिवार अंग्रेजों की जेलों में रहा, लेकिन सर नहीं झुकाया—यह था पंडित जवाहरलाल नेहरू का परिवार।
पंडित नेहरू और उनकी पत्नी दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन में जेल यात्राएँ कीं। उन्होंने अपना निजी घर भी भारत सरकार को राष्ट्रीय कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। यह सिर्फ राजनीति नहीं थी, यह एक यज्ञ था, जिसमें उन्होंने खुद को आहुति में डाला।
आश्चर्य की बात यह है कि कांग्रेस पर लगातार "परिवारवाद" का आरोप लगाया जाता है, परंतु क्या कोई ये बता सकता है कि पंडित नेहरू के प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी किसी पद पर थीं? नहीं। लेकिन वही नेहरू थे जिन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल की बेटी को राजनीति में आगे बढ़ाया, न कि अपनी बेटी को।
क्या इंदिरा गांधी के रहते हुए राजीव गांधी राजनीति में थे? नहीं। राजीव गांधी तो विमान चालक थे, राजनीति से दूर। और जब इंदिरा गांधी शहीद हुईं, तब परिस्थितियों ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया — जनता के समर्थन से, कांग्रेस कार्यालय के आदेश से नहीं।
इसी तरह, सोनिया गांधी चाहतीं तो 2004 में सहानुभूति लहर में प्रधानमंत्री बन सकती थीं, लेकिन उन्होंने देश को डॉ. मनमोहन सिंह जैसा विद्वान प्रधानमंत्री दिया। यही कांग्रेस की सोच है—सत्ता की नहीं, देश की सेवा की राजनीति।
कांग्रेस की सरकारों ने हरित क्रांति, संचार क्रांति, पंचायती राज, कंप्यूटर युग, और किसान-युवा योजनाओं को जमीन पर उतारा। ये सब देश के लिए दूरदृष्टि रखने वाली नीतियाँ थीं, न कि चुनावी जुमले।
आज जब देश में तानाशाही की मानसिकता हावी है, जब लोकतांत्रिक संस्थाओं का गला घोंटा जा रहा है, जब जनता के मुद्दों से ध्यान हटाकर केवल नफरत का व्यापार किया जा रहा है, तब राहुल गांधी ने निडर होकर भारत जोड़ो यात्रा की।
उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक पैदल चलकर जनता के दुख-सुख को जाना, समझा। उन्होंने बताया कि राजनीति का उद्देश्य पद नहीं, सेवा है।
यह वही पार्टी है, जिसने देश को संविधान दिया, लोकतंत्र की नींव रखी और विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा।
जब आज घर-घर तिरंगा की बात करने वाले लोग खुद आरएसएस के नागपुर मुख्यालय पर वर्षों तक तिरंगा नहीं फहरा पाए, तब सवाल उठता है—देशभक्ति की परिभाषा किससे ली जाए?
वे लोग जो ब्रिटिश सरकार से दया की भीख मांगते थे, जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को पकड़वाने का काम किया, वही आज कांग्रेस और गांधी परिवार को “पप्पू” कहकर अपमानित करने का दुस्साहस करते हैं।
याद रखिए —
जो अपने खून का एक-एक कतरा भारत माता को समर्पित कर चुके हैं, उन्हें पप्पू कहना सिर्फ गांधी परिवार का नहीं, बल्कि हर भारतीय बलिदानी का अपमान है।
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✒️ मलखान सिंह भदौरिया
(राजनीतिक विचारक, कांग्रेस नेता)