सिंदूर : भारतीय संस्कृति में प्रतीक, राजनीति में प्रपंच
लेखक: मलखान सिंह भदौरिया
भारतीय संस्कृति में सिंदूर केवल एक लाल रंग का चूर्ण नहीं है, बल्कि संस्कार, सम्मान, और संवेदनाओं का प्रतीक है। यह एक विवाहित महिला के सुहाग का प्रतीक है, जिसे उसके पति द्वारा उसके मांग में भरा जाता है। यह परंपरा सिर्फ एक धार्मिक कृत्य नहीं बल्कि भावनात्मक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व से जुड़ी होती है।
सिंदूर का हक़दार कौन?
हिंदू धर्म और सनातन परंपरा में सिंदूर केवल पति द्वारा पत्नी को भेंट किया जाता है। यह क्रिया विवाह के दौरान ‘सप्तपदी’ के साथ ‘सिंदूरदान’ के रूप में संपन्न होती है। सिंदूर न तो एक उपहार है और न ही कोई वस्तु जो कोई भी किसी को भेंट कर दे। यह एक प्रतिज्ञा है, एक बंधन है, और एक सम्मानजनक परंपरा है, जो केवल पति-पत्नी के रिश्ते में ही उचित मानी जाती है।
ऑपरेशन सिंदूर: भावनात्मक ज्वार या राजनीतिक व्यापार?
हाल के दिनों में “ऑपरेशन सिंदूर” जैसी मुहिम को लेकर सोशल मीडिया पर भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बहुत चर्चा हुई। यदि यह अभियान वास्तव में उन महिलाओं को न्याय दिलाने का माध्यम था, जिनका सिंदूर छीना गया – यानी जिनके पति मारे गए, लापता हुए या पीड़ित हैं – तो यह एक सकारात्मक पहल थी।
लेकिन जैसे ही इस अभियान के बाद भी सिंदूर बांटने का भावनात्मक खेल जारी रहा, सवाल उठने लाज़िमी थे। किस अधिकार से कोई अन्य पुरुष किसी महिला को सिंदूर भेंट कर सकता है? क्या यह सनातन परंपरा का अपमान नहीं? क्या यह सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए आस्था और भावनाओं की नीलामी नहीं है?
समाज में उठता आक्रोश
आज हजारों महिलाएं सोशल मीडिया पर पूछ रही हैं – "हमारे सिंदूर का अधिकार हमें कौन देगा?" और साथ ही यह भी – "कोई और कैसे सिंदूर दे सकता है?" यह आक्रोश सिर्फ महिलाओं का नहीं, हर उस व्यक्ति का है जो भारतीय संस्कृति की गरिमा को समझता है।
राजनीतिक स्वार्थ बनाम सांस्कृतिक संवेदनशीलता
राजनीति जब जनता के दुःख-दर्द को समझती है, तब वह जनसेवा बनती है, लेकिन जब वही राजनीति भावनाओं का बाज़ार लगाती है, तब वह स्वार्थ का साधन बन जाती है। यदि "ऑपरेशन सिंदूर" के पीछे का उद्देश्य महिलाओं को न्याय दिलाना था, तो वह सराहनीय था। लेकिन यदि वही मुहिम आज वोट बटोरने का भावनात्मक तमाशा बन चुकी है, तो यह भारत की अस्मिता का अपमान है।
निष्कर्ष
हिंदू और सनातन धर्म की परंपराएं केवल दिखावे के लिए नहीं हैं। वे जीवन जीने की गहराई से जुड़ी सीख देती हैं। सिंदूर केवल एक रंग नहीं, एक अधिकार है, जो केवल पति के हाथों ही महिलाओं की मांग में शोभा देता है। जो लोग "सनातन" का नाम लेकर महिलाओं की भावनाओं से खेल रहे हैं, उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए –
धर्म को चुनावी रणनीति न बनाएं,
और परंपरा को प्रचार का औजार न बनाएं।